राजस्थान में ट्रेंड रहेगा कायम या नामुमकिन होगा मुमकिन

दुनिया के सबसे बड़े चुनावी संग्राम की तारीखों का ऐलान हो चुका है. सत्ता को बचाए रखने और सत्ता को हासिल करने के लिए दोनों तरफ सेनाएं या तो सज चुकी हैं या सजाई जा रही हैं. तमाम तरह के प्री पोल और ओपीनियन सर्वे भी सामने आ रहे हैं. देश के सबसे बड़े राज्य यानी राजस्थान में भी चुनावी तारीखों के ऐलान के साथ ही सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं.
राजस्थान में 2014 की तरह ही इस बार भी 2 चरणों में मतदान होना है. दक्षिणी राजस्थान की 13 सीटों पर 29 अप्रैल को और उत्तरी राजस्थान की 12 सीटों पर 6 मई को मतदान होगा. राजस्थान की चुनावी फिजा पिछले कुछ साल में एक जैसे ट्रेंड स्थापित करती आई है. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या इस बार भी ट्रेंड बरकरार रहेगा या फिर बदलाव की बयार बहेगी.
सत्ता के साथ रहा राजस्थान का ट्रेंड
राजस्थान में लोकसभा की 25 सीटें हैं. पिछले 3 चुनावों का विश्लेषण करें तो सामने आता है कि मतदाताओं ने हर बार लोकसभा में उसी पार्टी की झोली भरी हैं जिसे विधानसभा में बहुमत दिया. 2003 में राज्य में बीजेपी की सरकार आई तो 2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 25 में से 21 सीटें मिल गई.2008 में कांग्रेस सरकार आ गई तो लोकसभा चुनाव-2009 में कांग्रेस को 21 सीटें मिल गई. इसी तरह 2013 में बीजेपी सरकार बनने के बाद लोकसभा चुनाव-2014 में बीजेपी ने 25 सीट जीतकर क्लीन स्वीप कर दिया.
लेकिन इस ट्रेंड के उलट लोकसभा चुनाव-1999 के आंकड़े बड़े ही रोचक हैं. तब करगिल युद्ध के एक महीने बाद ही (सितंबर-अक्टूबर, 1999) वोट डाले गए थे. राज्य में कांग्रेस की सरकार थी और बीजेपी के पास 200 में से सिर्फ 33 विधायक थे. इसके बावजूद करगिल जीत ने बीजेपी को पहली बार 25 में से 16 सीटें दिला दी थी. 8 महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव से 14% ज्यादा वोट भी बीजेपी ने हासिल किए. हालांकि उसकी वजह ये भी थी कि पार्टी ने जाटों को आरक्षण का वादा किया था. इसलिए कांग्रेस के इस परंपरागत वोटबैंक ने बीजेपी का साथ दिया.
2014 में बीजेपी को पहली बार 54.53% वोट मिले. कांग्रेस को 32.59% वोट और बीएसपी को  2.17% वोट हासिल हुए थे. बीएसपी इस बार विधानसभा में 6 सीटें जीतने में कामयाब रही है. ऐसी भी चर्चाएं चल रही हैं कि अगर कांग्रेस उत्तर प्रदेश में महागठबंधन में शामिल होती है तो वहां एसपी-बीएसपी की कम हुई सीटों की भरपाई राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से की जा सकती है. ऐसे में देखने वाली बात होगी कि क्या पहली बार मायावती की पार्टी राजस्थान से कोई सांसद लोकसभा में पहुंचा पाने में कामयाब होगी ?
कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर!
उम्मीदवारों के चयन पर बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियों में जोर आजमाइश जोरों पर है. हालांकि मीडिया में रोजाना आ रहे कांग्रेस नेताओं के विरोधाभासी बयान बता रहे हैं कि इधर गुटबाजी केसरिया खेमे से ज्यादा है. एक दिन उपमुख्यमंत्री और प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट बयान देते हैं कि विधायकों,  विधायक पुत्रों, 2 बार हारे हुए नेताओं और नेताओं के रिश्तेदारों के नाम पर विचार नहीं किया जाएगा. दूसरे दिन, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं कि उनकी इच्छा बेटे वैभव गहलोत को लोकसभा में भेजने की है. इसके बाद गुटबाजी की खबरों के लिए ज्यादा शब्दों की जरूरत बाकी ही नहीं रह जाती.
रस्साकशी बीजेपी के खेमे में भी कम नहीं है. खबर है कि कई सांसद अपनी सीट बदलना चाहते हैं. ऐसे सांसदों में केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और अर्जुन मेघवाल भी शामिल हैं. राठौड़ जयपुर ग्रामीण से सांसद हैं लेकिन अब वे अपने लिए किसी राजपूत बहुल सीट के जुगाड़ में हैं. बीकानेर में अर्जुन मेघवाल को भी जनता के विरोध का सामना करना पड़ रहा है. इसी तरह, 10 सीटों पर खुद पार्टी भी चेहरा बदलने की कोशिश में है. इनमें झुंझुनूं,सीकर, टोंक जैसी सीटें शामिल हैं.
सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और वसुंधरा राजे के गुटों में पुरानी अदावत है. बताया जा रहा है कि राठौड़ की सीट बदलने के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री ने अड़ंगा लगा दिया है. उन्होने पार्टी अध्यक्ष को मैसेज भिजवाया है कि केंद्रीय मंत्री की सीट बदलने से जनता के बीच गलत संदेश जाएगा. राठौड़ पिछली बार रिकॉर्ड वोटों से जीते थे लेकिन विधानसभा चुनाव-2018 में जयपुर ग्रामीण की की 8 में 6 सीटों पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है. राठौड़ को अंदेशा है कि जाट बहुल इस सीट पर सैनी, गुर्जर औऱ यादव वोट भी उनके खिलाफ पड़ सकते हैं. लेकिन गुटबाजी ऐसी है कि उन्हे इसी सीट पर घेरा जा रहा है.
क्या 2019 कुछ अलग रंग दिखाएगा ?
गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली के साथ राजस्थान उन राज्यों में रहा है जहां 2014 में जनता ने पूरी तरह बीजेपी में ही भरोसा जताया था.2019 में भी राजस्थान से बीजेपी ने मिशन-25 की रणनीति बनाई है.  पिछले ट्रेंड को देखते हुए लक्ष्य मुश्किल नहीं होता अगर यहां सरकार बीजेपी की होती. पर 3 महीने पहले सत्ता में आई कांग्रेस भी अब क्लीन स्वीप की रणनीति पर काम कर रही है.
विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें तो कांग्रेस का क्लीन स्वीप का सपना दूर की कौड़ी ही नजर आता है. दिसंबर-2018 में कांग्रेस ने 39.2% वोट हासिल किए थे. बीजेपी उससे सिर्फ 0.5% वोट पीछे रही थी (38.7%). कांग्रेस के तमाम दावों के बावजूद बीजेपी ने 73 सीटें जीत ली थी. जबकि कांग्रेस को बहुमत से कम यानी 99 सीटें ही मिल पाई थी. ऐसे में कहा जा सकता है कि जनता में बीजेपी को लेकर खास नाराजगी और कांग्रेस के प्रति विशेष उत्साह नहीं दिखता है.
जनवरी और फरवरी में हुए कुछ चुनावी सर्वे दिखा रहे हैं कि इस बार जनता अब तक कायम रहे ट्रेंड को बदल सकती है. सत्ता भले ही कांग्रेस के पास हो लेकिन बीजेपी 25 में से 20 सीटों पर जीत दर्ज कर सकती है. हालांकि इतनी सीटों के बावजूद उसे पिछली बार से 5 सीटों का नुकसान ही होगा. देखने वाली बात ये भी होगी कि क्या ये सर्वे और पोल सच साबित होंगे या फिर 2004 की तरह नतीजे एकदम चौंकाने वाले होंगे.
वैसे, पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टोंक और चूरू में 2 जनसभाएं कर चुके हैं. सभाओं में उमड़ी भीड़ उनके जादू के बरकरार रहने को दिखाती है. विधानसभा चुनाव के समय सोशल मीडिया पर चला नारा भी इस बात की तस्दीक करता है. 'रानी तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं', यही वो नारा था जो दिखाता है कि केंद्र सरकार के मुखिया के तौर पर जनता नरेंद्र मोदी को एक मौका और देने के मूड में हो सकती है.

<<<<<- like page and app ->>>>>


Whats Number : 9509193941


Comments

Popular posts from this blog

राजस्थान के निम्बावास गांव में है एशिया का सबसे बड़ा कीड़ी नगरा

बर्तन में फंस गया था 3 साल के मासूम का सिर, मां का था बुरा हाल, फिर ऐसे निकाला

चण्डीनाथ‬ महादेव मंदिर भीनमाल के गौरवमय अतीत